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सुनीता का बचपन गांव में बीता था, वहीं उसने अपनी पढ़ाई की थी| गांव में अंग्रेजी माध्यम की कोई स्कूल ना होने के कारण अपनी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से ही की थी| लेकिन बाद में कॉलेज की सुविधा ना होने के कारण आगे ना पढ़ पाई क्युकी गांव से बाहर जाकर पढ़ाई की अनुमति नहीं थी|इसलिए सुनीता की पढ़ाई छूट गई| और वो अपनी मां के घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी| अपनी दादी से तरह तरह की कढ़ाई बुनाई सीखी| जल्दी ही एक अच्छा घर देख कर सुनीता की शादी कर दी गईं|

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शादी के बाद सुनीता मुंबई जैसे महानगर में आ गई| पहली बार गांव की दुनिया से निकली सुनीता मुंबई के चकाचौंध देख रही थी| उसके लिए ये सब दूसरी दुनिया के जैसा था|

सुनीता के घर में सभी पढ़े लिखे लोग थे| पति भी उच्च पद पर कार्यरत थे| सुनीता की सास को घर में काम करने वाली सीधी बहू के रूप में नौकरानी चाहिए थी| इसलिए इस सुनीता से अपने बेटे की शादी कराई थी|

सुनीता के पति समीर को वैसे तो सुनीता पसंद ही थी लेकिन वो उसे अपने साथ कहीं लाने ले जाने से हिचकिचाता था| ऑफिस की बड़ी बड़ी पार्टी में सुनीता के साथ जाने में उसे असहजता होती थी|

धीरे धीरे सुनीता ने घर की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली| लेकिन घर वालों के लिए उसकी जरूरत सिर्फ घर के काम के लिए थी|

घर के जरूरी बात चीत का उसे हिस्सा नहीं बनाया जाता था| सुनीता कभी अपनी बात रखना भी चाहती थी तो लोग देवर ननद उसका मजाक उड़ा देते, की आप अपनी गांव की सोच अपने पास ही रखिए| और सभी ठहाका लगा कर हंस देते|

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कुछ समय बीता सुनीता का नन्हा सैतान भी 6 वर्ष का होगया| ननद की शादी होगी| देवर के लिए रिश्ता देख रहे थे|

आज देवर के लिए लड़की देखने जाने वाले थे| ननद भी अपने पति के साथ आ गई थी सुनीता ने भी एक सुंदर सी साड़ी निकाली और अच्छे से तैयार हो गई|

“अरे भाभी आप कहां चल ली” सुनीता की ननद ने तंज कसते हुए कहा|

“अरे बहू तुम हमारे साथ नहीं चल रही हो, वो लोग बहुत अच्छे घर के लोग हैं| लड़की भी वकील है, तुम वहां अपना गवार पना दिखाने चल रही हो क्या| जाओ देखो सब तैयारी हो गई क्या|” सुनीता की सास ने टका सा उत्तर दे दिया|

“मां ये क्या बोल रही हो,सुनीता भी तो इस घर की सदस्य है| उसे भी चलना चाहिए साथ|” सुनीता के पति ने समर्थन किया|

“नहीं नहीं रहने दीजिए,मेरा सर दुख रहा है मैं नहीं जा पाऊंगी | ” सुनीता अपने आंसू छुपाते हुए वहां से भाग आई|

“चलो चलो बहुत देर हो गई है|” बाहर से आवाज आई|

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“लड़की वालों ने घर का पता तो भेज दिया है ना| जल्दी से गूगल में जाके के पता डाल कर देखो| “ससुर जी ने समीर से कहा|

“पापा पापा गूगल क्या होता है” बेटे आदि ने पूछा|

“गूगल” ये एक सुविधा है, जिसमें हमें कोई जानकारी चाहिए होती है कुछ खोजना होता है तो हम पता लगा सकते है “समीर ने बेटे को समझाया|

“अरे मम्मी भी तो फिर गूगल ही है|”

आदि की बात ने सभी का ध्यान अपनी और खींचा|

“तेरी मम्मी तो गवार है” सासू जी मन ही मन बुदबुदाई|

“देखो पापा, आज सुबह जब दादा जी को उनकी दवाई नहीं मिल रही थी तो उन्होंने मम्मा को ही आवाज दी, फिर मम्मा ने ही उनको दवाई दी| फिर बाद में दादी का फोन का चार्जर नहीं मिला तो भी मम्मा ने ही दिया| चाचू ने शर्ट के आयरन के लिए भी मम्मा को बोला| जब पापा आपकी फाइल नहीं मिल रही थी उस दिन तब मम्मा ने ही खोज के दी थी| मुझे भी पापा जो भी चाहिए होता है मम्मी ही देती है| बोलो दादी है ना मम्मा गूगल?”

सभी लोग एक दूसरे का चेहरा देख रहे थेऔर शर्मिंदा हो रहे थे|

“आप एक दम ठीक बोल रहे हो बेटा| चलो मम्मी को भी जाकर हम बताते है|” समीर ने कहा|

“सब को मेरी पत्नी को साथ नहीं ले जाना तो मैं भी साथ नहीं चल सकता| जाने अनजाने मैंने भी उसका बहुत दिल दुखाया है, लेकिन आज मेरे बेटे ने मेरी आंख खोल दी, की मेरी बीवी ने है इस घर को संजो रखा है| आप सब जाके अपनी दूसरी पढ़ी लिखी बहू देख आइए|” समीर ने कहा|

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